महाभोज - मन्नू भंडारी
महाभोज एक क्रांतिकारी समवेदना जगाने वाला उपन्यास है । इस उपन्यास के माध्यम से आज़ादी के बाद राजनीति के पतन और सिद्धांतों की मौत को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है । इसमें जातिवाद की वजह से समाज में पड़ी दरार भी बोहोत उभर कर दिखाई देती है ।
शीर्षक
महाभोज का आम भाषा में अर्थ है बड़ी दावत किसी महत्वपूर्ण ---- । इस कहानी में महाभोज है एक राजनीतिक महाभोज बिसू के मरने पर ।
कहानी संक्षेप में
सरोहा गाँव में काफ़ी सुगबूगाहट है, वजह ? कुछ घटनाओं की वजह से । कुछ दिन पहले हरिजनों टोली की झोपड़ियों में बहुत ही अमानवीय ढंग से आग लगा दी थी किसी ने, जिस से काफ़ी लोगों की मौत हुई थी, असली कातिल तो नहीं पकड़े गए मगर दो मामूली से हवलदार बर्खास्त हो गए । अभी हरिजन बिसेसर (बिसू) नाम के व्यक्ति की लाश मिली है । विधानसभा के उपचुनाव होने को है जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री सुकुल बाबू खुद खड़े हो रहे है । विपक्ष में वर्तमान मुख्यमंत्री दा साहब ने अपने ही एक संरक्षण में पले हुए आदमी को खड़ा कर दिया है। इन सब घटनाओं की वजह से गाँव में राजनीति की मशाल धू धू कर जलने को तैयार है जो अपने सामने आने वाले किसी भी पतंगे को निर्ममता से जला देने की क्षमता रखती है । विपक्ष और सत्ताधारी पक्ष दोनो यह उपचुनाव जीतने में अपने हथकंडे अपना रहे है । बापू और नेहरू को अपना आदर्श मानने वाले राजनेता सत्ता और कुर्सी के लोभ की वजह से अपने पथ से भ्रमित हो जाते है । पहले बिसू की लाश की आग पे हाथ सेकने सुकुल बाबू आते है, गाँव में भाषण देने और हत्या का बदले दिलाने के बदले सहानुभूति और वोट बटोरने । फिर राजनीति की अगली बिसात पर बिकती है लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाने वाली पत्रकारिता और पारितोषिक में मिलता है कोटा राज का अधिक काग़ज़, विज्ञापन और सत्ता से नज़दीकी का सुख और अनुभूति । इस की भेंट चढ़ता है सच और छपने लगता है सत्ता के पक्ष में खबरें । अगला सर बलिदान होता है क़ानून व्यवस्था का, और बिसेसर की मौत पहले आत्महत्या, फिर गाँव के दबंग द्वारा हत्या और अंत में उसके बेक़सूर मित्र को सूली पर चढ़ा दिया जाता है । और बदले में इस व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाने वालों को मिलती है तरक़्क़ी, समाज में इज़्ज़त और काला पैसा ।
ऐसा नहीं की इन सबके बीच कोई भी ईमानदार व्यक्ति नहीं है । परंतु उन लोगों को ये कुर्सी की राजनीति हाशिए पे पटक देती है, या तो उनका जीवन तबाह कर देती है । बिसेसर जो पढ़ा लिखा होने के बावजूद गाँव में विद्यालय चलता है और हर जाती के बच्चों को पढ़ता है । चार साल बिना किसी आरोप के जेल में बंद रहता है और पुलीस के उत्पीड़न का शिकार बनता है । नयी सरकार की वजह से छूटता है और गाँव वापस आके मज़दूरों को अपने हक़ के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करता है, जो वहाँ के पंचायत और दबंग को फूटी आँख भी नहीं सुहाता है और अंत में मार दिया जाता है। सक्सेना साहब जो एस पी है और मामले की छानबीन कर रहे है, सत्य की पूरे दिल से छान बिन करते है, और अंत में निलम्बित किए जाते है । लोचन बाबू को राजनीति के अपवाद साबित होते है, और अपने और अपनी पार्टी के सिद्धांतों का क़त्ल होते नहीं देख पाते और सरकार के तखतापलट की तैयारी करते है, बाज़ार में बिकने वाले विधायकों के भरोसे । अंत में अपने शिक्षा मंत्री के पद से हाथ धो बैठते है और पार्टी से निकाल दिए जाते है । और अंत में बिंदा जो अन्याय के ख़िलाफ़ बिसू का साथ देने वाला और हरिजनों के क़त्ल का सबूत खोज कर दोषियों को सजा दिलवाने के सपने देखने वाला ही अपने मित्र का कातिल करार दिया जाता है और पुलीस की ख़ातिरदारी का हकदार बनता है ।
अन्य
- राजनीतिक पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास
- गरीब, किसान, हरिजन के उत्पीड़न और निर्मम शोषण को दर्शाती हुई कहानी
- आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार और जनता पार्टी के शाशनकाल की पृष्ठभूमि
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