स्कंदगुप्त - जयशंकर प्रसाद

नाटक का सारांश 

१ पहला अंक 

स्कंदगुप्त सत्ता में निहित्त अधिकार को लेकर चिंतन कर रहा है । उसे लगता है सत्ता इंसान को विवेकहीन बना देती है । उसका मन राजसिंघासन पर बैठने में नहीं है । पर्णदत्त स्कंदगुप्त को अपने अधिकारों को वहन करने और साम्राज्य सम्भाले को प्रेरित करता है ताकि त्रस्त प्रजा को आतंकियों से निजात मिल सके । हूणों ने मालव राष्ट्र पर आक्रमण कर दिया है,  बंधुवर्म्मा सहायता माँगता है और स्कंदगुप्त उनकी मदद करने का निर्णय लेता है। सम्राट कुमारगुप्त भोग विलास में डूबे हुए है और उनका फ़ायदा उठाने के लिए दूसरी रानी अनंतदेवी षड्यंत्र रच रही है । मातृगुप्त (कालिदास) अपने जन्मभूमि कश्मीर जो उनसे छूट गया है उसके बारे में कविता गाते है । स्कंदगुप्त सम्राट का बड़ा पुत्र है इसलिए उसे ही सिंघासन पर राज करना है मगर अनंतदेवी अपने पुत्र पुरगुप्त को राजा बनाने का षड्यंत्र रच रही है । इस कार्य में उसका साथ देता है महाबलाधिकृत भटार्क, जो अपने प्रति व्यवहार से खुश नहीं है और तांत्रिक प्रपंचबुद्धि । उसे पुष्यमित्रों के युद्ध में सेनापति नहीं बनाया जाता है मगर अनंतदेवी की कृपा से वो महाबलिधिकृत बन जाता है । सम्राट कुमारगुप्त का अंतिम समय और धोखे से गुप्त रूप से पुरगुप्त को राजा घोषित कर दिया जाता है । शक और हूणों की सेना साम्राज्य में आतंक मचा रही है । स्कंदगुप्त हूणों से बंधुवर्म्मा, विजया, देवसेना और जयमाला की जान के साथ मालव को भी बचता है । 

२ दूसरा अंक 

देवसेना और विजया में तर्क वितर्क यह पृथ्वी स्वर्ग है या नरक । विजया स्वीकार करती है की स्कंदगुप्त ने उसके हृदय को पराजित किया है । स्कंदगुप्त के हृदय में अभी अभी चैन नहीं, वो उदासीन है अपने विजय और राजसत्ता को ले कर, उसके हिसाब से त्याग ही सबसे महान महत्व है । वह अपने सिंघासन का त्याग का मन रखता है और पुरगुप्त को राज देने का विचार प्रस्तुत करता है, जिसका चक्रपालित विरोध करता है और उसे राज के लिए उत्तेजित करता है । विजया धनवान है शायद इसलिए देवसेना उसे चिढ़ती है यह सोचकर की उसकी दृष्टि में वैभव ही सबकुछ है । देवसेना को गाना गाना बहुत पसंद और हर अवसर बिना गान के सम्पन्न नहीं मानती । बंधुवर्म्मा स्कंदगुप्त के पराक्रम और हृदय से प्रसन्न होता है और अपना सब कुछ अर्पित करने की प्रतिज्ञा लेता है । प्रपंचबुद्धि और भटार्क मिलकर शर्वनाग को महादेवी देवकी की हत्या करने के लिए तैयार कर लेते है । शर्वनाग मदिरापान के नशे में चूर देवकी के राजमहल पहुँचता है उसकी हत्या करने के लिए, जाह उसे रोकती है उसकी पत्नी रामा । रामा देवकी को जा कर अवगत करती है की उसके प्राण ख़तरे में है । स्कंदगुप्त ठीक समय पर पहुँच कर अपनी माँ की जान बचता है और अनंतदेवी, शर्वनाग और भटार्क को बंदी बना लेता है । बंधुवर्म्मा अपने भाई भीमवर्मा और पत्नी जयमाला को राजाधिकर स्कंदगुप्त को सौपने की मंशा से अवगत करता है और उन्हें इसके लिए माना लेता है । कमला अपने पुत्र भटार्क को खरी खोती सुनती है । गोविंदगुप्त स्कंदगुप्त को आशीर्वाद देता है, जो कुमारगुप्त से रूठा था । गोविंदगुप्त स्कंदगुप्त का महाबलाधिकृत बन जाता है । देवकी की आज्ञा से सबको जीवनदान मिलता है । स्कंदगुप्त शर्वनाग को अंतर्वेद का विषयपती नियुक्त करता है और भटार्क को महाबलाधिकारी । विजया भटार्क को चुनती है । 


३ तीसरा अंक 

प्रपंचबुद्धि और भटार्क फिर से मिलते है । विजया देवसेना से मिलती है और उसे अपना दुश्मन घोषित करती है । प्रपंचबुद्धि को उग्रतारा की साधना के लिए शमशान में राजबलि की आवश्यकता है और विजया देवसेना को वहाँ लाने के लिए सहमत हो जाती है । मातृगुप्त ओट में से प्रपंचबुद्धि की योजना सुन लेता है । स्कंदगुप्त के हृदय में अभी भी अशांति है, उसे लगता है उसके अस्तित्व की वजह से राज्य में और परिवार में अशांति है । विजया धोखे से देवसेना को शमशान में ले आती है, प्रपंचबुद्धि की बाली के लिए, मातृगुप्त आके देवसेना की रक्षा करता है । अनंतदेवी पुनः भटार्क, पुरगुप्त और हूण आक्रमणकारी खिंगिल के साथ मिल के षड्यंत्र रच रही है । पुरगुप्त हर समय मदिरा पान के नशे में डूबा रहता है और उसकी सेवा विजया करती है । भटार्क राज्य का महाबलिधिकृत होने का ग़लत लाभ उठता है और सेना को आक्रमणकारियों से युद्ध के बदले भोग और विलास के समारोह आयोजन करता है । एक सैनिक इसका विरोध करता है परंतु उसे दबा दिया जाता है । देवसेना दुःख के गीत गाती है । गोविंदगुप्त वीरगति को प्राप्त होते है और बंधुवर्म्मा नए महाबलाधिकृत बनते है । मातृगुप्त को देवसेना की रक्षा के पुरस्कार स्वरूप कश्मीर का राज दिया जाता है । सिंधु प्रदेश में मलेछों का पतन होता है, स्कंदगुप्त विक्रमादित्य की उपाधि धारण करता है । राष्ट्र में शांति की लहर आती है । गन्धार में युद्ध, भटार्क हूणो के साथ संधि कर के स्कंदगुप्त को धोखा देता है । बंधुवर्म्मा वीरगति को प्राप्त होते है । भटार्क जहां युद्ध हो रहा होता है वहाँ का बांध खोल देता है और नदी में अचानक के जल का स्तर बध जाता है, सारे वीर योद्धा बह जाते है । स्कंदगुप्त जीत की अत्यंत पास पहुँच कर पराजित होता है

४ चतुर्थ अंक 

अनंतदेवी और विजया के बीच में कहा सुनी हो जाती है । शर्वनाग विजया को मिलता है और अपने साथ चल कर राष्ट्र कल्याण के लिए साथ चलने के लिए बोलता है और विजया चल लेती है । देवकी और कमला भटार्क से मिलते है, दोनो उसे उसकी कृतघ्नता के लिए कोसती है । देवकी की पुत्र शोक में मृत्यु हो जाती है । भटार्क शास्त्र त्याग कर देता है और देवकी की अंत्येष्टि क्रिया करता है पंचनद को हूणों ने अपने अधिकृत कर लिया है और कश्मीर पर आक्रमण करने वाले है । 

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